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अपना शहर….

बस्ता औे स्कूल छोड़ आया हूं

खेल कूद के कुछ जख्म छोड़ आया हूं

बचपन के संगी साथी छोड़ आया हूं

वो कॉपी में मिले स्टार छोड़ आया हूं

वो गली औ मुहल्ला छोड़ आया हूं

मां बाप से मिली फटकार छोड़ आया हूं

वो प्यार और दुलार छोड़ आया हूं

जिद्द से भरे हथियार छोड़ आया हूं

रूठने मनाने का सफर छोड़ आया हूं

खेल खिलौनों का भंडार छोड़ आया हूं

पीछे यादों का अंबार छोड़ आया हूं

अपने हिस्से का आधा संसार छोड़ आया हूं

हां, मैं अपना शहर छोड़ आया हूं।।

बुढ़ापा आता नहीं…..

बुढ़ापा कब आता है…..ये बहुत ही समझने वाला विषय है……….

बच्चे बड़े हो गए, अपने पैरों में खड़े हो गए

और हम को लगा हम बूढ़े हो गए

बुढ़ापा शारीरिक कमजोरी नहीं

बुढ़ापा कोई विकार भी नहीं

अपितु बुढ़ापा तो सिर्फ हमारी सोच की उपज है

तो क्या हो गया, आंखों में चश्मा लग गया

तो क्या हुआ घुटनों में बंडेज बंध गया

तो क्या हुआ याददाश्त कुछ कमजोर हो गई

तो क्या हुआ दवाइयों का पुलिंदा लग गया

तो क्या हुआ नौकरी से रिटायरमेन्ट मिल गया

तो क्या हुआ उम्र की संख्या बढ़ गई

पर बूढ़े फिर भी हम नहीं

बूढ़े तो वो हैं जो…

कम उम्र में जोश खो बैठे

नासमझी में होश खो बैठे

हार के हिम्मत टूट गए

सपनों से भी रूठ गए

छोटी उम्र में दिखते हैं बड़े

और कहते हैं कि हम अपने पैरों में हैं खड़े

बात बात पर झिड़कें पैरेंट्स को

कहते आप नहीं समझोगे

सच ही तो है, अब वो बड़े हो गए

पर हम तो अब भी बच्चे हैं

मुक्त हो गए जिम्मेदारियों से

जिएंगे अब तो जी भर कर

अपने लिए…बन के नादान से बच्चे

सच ही तो है बुढ़ापा आता नहीं है

बुढ़ापे को बुलाया जाता है।।

तिनका तिनका…..

सपनीली आंखों में मचल रहा हूं

मुठ्ठी से यूं फिसल रहा हूं

हिमगिरि में पिघल रहा हूं

तिनका तिनका उड़ रहा हूं….

गिर कर भी,शिखर रहा हूं

धूप छांव से निखर रहा हूं

हार जीत से बेफिक्र रहा हूं

तिनका तिनका उड़ रहा हूं….

बढ़ते बढ़ते नहीं मुड़ रहा हूं

नई तरंगों से जुड़ रहा हूं

बन महक फिजाओं में घुल रहा हूं

क्यूंकि तिनका तिनका उड़ रहा हूं।।

बचपन की कहानी

चारपाई के चारों ओर हम बच्चों का झुंड इकठ्ठा होता था और बीच में बैठी हम सबकी दादी । जाड़े के दिन वो अपने को कम्बल में कस कर लपेट लेती थीं और उनकी चारपाई के नीचे रख्खा होता था जलता हुआ कोयले का तस्ला जिसकी गर्मी का अहसास आज भी रूह को महसूस होता है। आजकल के हीटर और फाइबर की रजाईयां सब फीकी हैं उस गर्माहट के सामने। फिर हम बच्चों का समूह एक दूसरे से सट कर बैठता था तो ठंड का तो दूर दूर तक कहीं नामों निशान भी न था। दादी जिनको घर के सब लोग ‘ बहू ‘ कहते थे और तो और हम सब बच्चे भी उन्हें इसी नाम से बुलाते थे। दादी का वो पान दान आज भी नहीं भूलता और उनके मुंह से हर समय पान की खुशबू ….। दादी की एक अलमारी होती थी जिसमें वो हम बच्चों से छिपा कर भोग लगाने के लिए मिश्री रक्खा करतीं थीं उस मिश्री की मिठास के आगे दुनिया की सारी मिठाई फीकी थीं और हम बच्चे उतावले रहते थे उनसे मिश्री मांग मांग हर समय उनको परेशान करना । फिर दादी की वो लड्डू गोपाल की सेवा और रोज पंजीरी का बनना अहहा….बचपन की हवा की वो भीनी भीनी सी सुगंध मन मस्तिष्क में एक अलग ही छाप डालती है और फिर रात को दादी की चारपाई को घेर हम बच्चों का झुंड एक के बाद एक कहानियों की फरमाइश कर कब सो जाता था पता ही नहीं चलता था। न मच्छरों का प्रकोप और न ही बिजली के जाने की चिंता….दादी की वो उड़ने वाले हाथी की कहानी और दादी की वो अपनी भाषा और अपना अंदाज …..’ ई कीका हाथी है, ई कीका हाथी है ‘ और हां वो अंदाज जब दादी कहना शुरू करती थीं….सब लड्ड पद्द करके गिरे, किसी का हाथ टूटा किसी का सिर फिर जो हम बच्चों का जोर जोर से ताली बजा कर हंसना शुरू होता था मानो दादी को मालूम होता था कि अब बच्चों का हंसने वाले पार्ट शुरू होने वाला है तो दादी कहानी के इस भाग को और भी मनोरंजक बनाने की कोशिश करतीं थीं….दादी की याद आते ही मन बचपन की उस फिजा में पहुंच जाता है जहां सिर्फ और सिर्फ प्यार और प्यार से भरपूर दादी का हृदय, जो कभी नहीं भुला सकता।

पड़ाव…..

कुछ साल उम्र के ऐसे गुजर जाते हैं जैसे अभी कल ही की बात हो फिर शुरू होता है एक सफर…… अंजानी सी राह,अजब सा भय और अकेलेपन का अहसास, जी हां ये वही सफर है जिसको तय करने के लिए न जाने कितने बच्चे रोज अपना आशियाना छोड़ निकल पड़ते हैं अपने अगले पड़ाव की ओर और छोड़ जाते हैं अपने पीछे अनगनित यादें जिनको सहेजने में उनके मां बाप की तमाम उम्र यूं ही निकल जाती है

समय बीतता जाता है, कुछ दिन , कुछ महीने, कुछ साल और फिर ‘ कुछ ‘ हो जाता है सब कुछ यानि कि एक न खत्म होने वाला इंतजार। बच्चे बढ़ते जाते हैं अपने अगले पड़ाव की ओर …. दूर बहुत दूर

मंजिलें तो बहुत मिलेंगी

दूर बसने वालों

कभी झांक कर देखो

उस आशियाने में

जो नहीं है ईंट पत्थर का

अलग सी दुनिया बसती है

कभी महसूस करो

लौट कर कभी आया करो

उस वीराने में भी

वो घर से अलग घर है

जहां सिर्फ दर्द ही दर्द है।

पड़ाव तो बहुत मिल जाएंगे पर घर और घर से अलग घर…कहीं नहीं मिलेगा।

चुप क्यों हो…

बहुत दूर निकल आए…चलते चलते…अब पता चला कि जिंदगी रुकती नहीं एक पल के लिए। रात के अंधेरे और गहन सन्नाटे में एक आवाज गूंजती है और वो है खामोशी की। सांय सांय करते ये वीराने और टूट जाती खामोशी जरा सी आहट से। फिर भी जिंदगी रुकती नहीं एक पल के लिए। अथाह गहराई लिए समुद्र आहें भरता है, दर्द कितना है न कभी किसी से कहता है, शोर मचाता है पर नहीं कोई सुनता है फिर भी जिंदगी रुकती नहीं एक पल के लिए। अजब सा दस्तूर है बोलो कि तुम चुप क्यों हो….तुम्हारी खामोशी भी अब कुछ जतलाती है, दूर से कोई सदा ये आती कि चलो और चलो कि चलते जाना है, कुछ भी हो जिंदगी रुकती नहीं एक पल के लिए…. दर्द में भीग कर जो तुम शरमाते हो, सुर्ख गालों से होकर गुजर जाते हो और फिर होठों पर आकर ही अटक जाते हो, बोलो कि तुम आज चुप क्यों हो…..